उस शहर में कोई आंदोलन, कोई प्रोटेस्ट, कोई नारेबाजी नहीं होती थी… न ही किसी मंत्री का इस्तीफा मांगा जाता था… क्योंकि उस शहर में दफ्तर बहुत थे… रात को लोग जल्दी सो जाते थे कि सुबह दफ्तर जाना है… हर आदमी अपने काम से काम रखता था…. सड़क पर चलता हर आदमी या तो दफ्तर से आ रहा होता था… या दफ्तर जा रहा होता था… न शहर के लोग गुस्से में कहीं जमा होते थे और न ही कोई अनशन करता था… वो बहुत शांत… खामोश… एक तरतीब में चलने वाला शहर था… इसलिए नहीं कि वहां सब कुछ ठीक था… इसलिए कि लोगों को आदत हो गयी थी इसी तरह जीने की… लेकिन एक दिन… सब कुछ बदल गया… शहर में कुछ ऐसा हुआ कि हज़ारों लाखों की भीड़ गुस्से में हुक्मरानों की तरफ… चली जा रही थी… उनके हाथों में झंडे थे और ज़बान पर एक मांग थी… क्या थी वो मांग… और वो क्या था जिसने पूरे शहर के लोगों को अचानक क्रांति करने पर मजबूर कर दिया… सुनते हैं कहानी