लद्दाख के प्रसिद्ध कार्यकर्ता और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक ने गुरुवार को गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में अपनी 26 दिनों की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल समाप्त कर दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया बयान के बाद यूनियन मंत्री जेपी नड्डा और पीएमओ राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह की मौजूदगी में यह महत्वपूर्ण घटना हुई। वांगचुक ने खुद अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट पर इसकी पुष्टि की और बताया कि लंबी बातचीत तथा कई सांसदों की अपील के बाद यह कदम उठाया गया।
वांगचुक की हड़ताल शुरू में लद्दाख की लंबित मांगों जैसे राज्य का दर्जा और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी थी, लेकिन बाद में यह शिक्षा व्यवस्था की खामियों खासकर NEET जैसी परीक्षाओं में पेपर लीक और युवाओं पर अत्याचार के मुद्दे पर केंद्रित हो गई। उन्होंने Cockroach Janta Party समेत छात्रों के शांतिपूर्ण आंदोलन का समर्थन किया और मांग की कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कोई बल प्रयोग या झूठे मामले न दर्ज किए जाएं। हड़ताल के दौरान उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा था। करीब ग्यारह किलो वजन घटने और मांसपेशियों के कमजोर होने के बाद उन्हें सफदरजंग अस्पताल से मेदांता शिफ्ट किया गया था।
अस्पताल में रहते हुए भी वांगचुक सक्रिय रहे। उन्होंने सरकार से स्पष्ट आश्वासन मांगा कि छात्रों पर कोई दमनकारी कार्रवाई न हो। कई सांसदों ने व्यक्तिगत रूप से या पत्र के जरिए उन्हें हड़ताल समाप्त करने की अपील की। करीब 65 सांसदों की यह पहल निर्णायक साबित हुई। वांगचुक ने अपने पोस्ट में लिखा कि देश में हिंसा की किसी भी संभावना को रोकने के लिए यह फैसला लिया गया। उन्होंने सभी से अपील की कि आंदोलन शांतिपूर्ण तरीके से जारी रखा जाए।
सरकार की ओर से परीक्षा प्रणाली में सुधार और सख्त कानून बनाने का संकेत मिलने के बाद यह समझौता संभव हुआ। जेपी नड्डा पहले भी प्रदर्शनकारियों से मिल चुके थे और संवाद का माहौल बनाने की कोशिश की थी। इस घटना को कई लोग छात्र आंदोलन में सकारात्मक विकास मान रहे हैं, हालांकि कुछ कार्यकर्ता कह रहे हैं कि मूल मुद्दों पर नजर रखनी होगी।
वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो अस्पताल में उनके साथ रहीं। लद्दाख के एपेक्स बॉडी के वरिष्ठ नेता भी मौजूद थे। कार्यकर्ता अब पूर्ण स्वास्थ्य लाभ पर जोर दे रहे हैं क्योंकि आगे कई चुनौतियां बाकी हैं। वांगचुक ने वादा किया है कि वे शर्तों पर विस्तृत वीडियो जारी करेंगे।
यह घटना न केवल शिक्षा नीति बल्कि केंद्र और नागरिक समाज के बीच संवाद की अहमियत को रेखांकित करती है। युवाओं की चिंताओं को गंभीरता से लेने की मांग अब और तेज हो गई है।